Monday, 20 April 2015

Expectations..( उम्मीदें)

Expectations. (उम्मीदें)


हम स्टूडेंट्स की जिन्दगी भी एक दावं की तरह है, अगर दावं लग गया समझो जिन्दगी सवर गयी नहीं तो झुझते रहो अपनी नईयां लेकर, घर से निकले नहीं की परिवार वालो की उम्मीदें पहले ही बढ़ जाती हैं की अब तो लड़का/लड़की कुछ कर ही लेगा मगर उन्हें ये कौन समझाएगा की असली परीक्षा तो अब शुरी हुई है वो तो केवल बस मात्र एक ट्रेलर था, हम घर से तो निकलते है यही सोच के की, घर छोड़ा है तो कुछ न कुछ तो कर के ली लौटेंगे मगर दुनिया की इस चकाचौंध ने बहुतों का ध्यान भटकाया हैं, और इसी चक्कर में बहुतों ने अपना समय भी गवाया है | हम भी भटके थे, मगर समय रहते संभल गये क्यूंकि हम लड़कियों को यहाँ सोचना जादा पड़ता है की अगर कुछ किया नहीं तो परिवार वाले शादी कर देंगे | तो इस वजह से हम पर प्रेशर कुछ जादा ही रहता है | 
पढाई और करियर की टेंशन कम रहती है जो परिवार वालो की उम्मीदों का पूल अलग बढ़ जाता है अगर कुछ कर गये तो परिवार वालो की वाह- वाही बटोरो वरना पूरी जिन्दगी ताने सुनो, अब आप ये सोच रहे होंगे की मैं ये क्या अनाप – सनाप लिख रही हूँ मगर माफ़ कीजिएगा मैं वही लिख रही हूँ जो इस वक्त वो हर सक्श इसी उधेड़बुन में फसा होगा जो अपने करियर के अंतिम दौर में होगा | भगवान से यही कह रहा होगा की कही तो नैया पार लगा दो | मैं बस इतना ही कहना चाहती हूँ की उम्मीद इतना भी न बना ले की आप अपने आप को फिर संभाल ही न पाए ये बातें मैं दोनों के लिए बोल रही हूँ ख़ास तौर पे माता –पिता को क्यूंकि आप की जितनी उम्मीद बढती है हमारी परेशानी भी उतना ही बढ़ जाती है | उम्मीदों का पुल उतना ही बनाये जितना आप पूरा कर सकें...  

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